Monday, August 21, 2006

मुंशी प्रेमचंद को सलाम

हिन्दी साहित्य और उर्दू अदब के अज़ीम कलमकार मुंशी प्रेमचंद की 125 वीं जयंती के अवसर पर ई-छत्तीसगढ़ की ओर से श्रद्धा सुमन अर्पित है साहित्य जगत में प्रेमचंद की तुलना किसी और से करना किसी सूरत में मुनासिब नहीं होगा । वे सिर्फ हिन्दुस्तान ही नही दुनिया भर के हिन्दुस्तानी जुबान बोलने वाले लाखों करोड़ो लोगों के बीच एक अहम स्थान रखते हैं। प्रेमचंद को लेकर पड़ोसी देश पाकिस्तान के साहित्यकार किस तरह सोचते है- यहां प्रस्तुत करते हुए हमें हर्ष और गौरव की अनुभूति हो रही है (ज़ियाकुरैशी)
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हिन्दी के अमर कथाकार मुंशी प्रेमचंद जितने भारत में लोकप्रिय है, उसमें कम लोकप्रिय पाकिस्तान में नहीं है। यह कहना है प्रेमचंद की 125 वीं जयंती के समापन समारोह के सिलसिले में भारत आए पाकिस्तानी लेखकों का। इन लेखकों ने कहा कि प्रेमचंद पर हमारा हक ज्यादा बनता है, क्योकि वह पहले उर्दू के लेखक है जो बाद में वह हिन्दी में आए।
कहानीकार मसूद अगशर, नाटककार सैयद असगर नदीम और मिर्जा हामिद बेग ने कहा कि प्रेमचंद ने उर्दू अफसानी की बुनियाद रखी है। उनके बगैर उर्दू अदब की कल्पना नहीं की जा सकती है। अशर ने बताया कि प्रेमचंद की पुस्तके पाकिस्तान में मैट्रिक से लेकर एम.ए. तक के पाठ्यक्रमों में पढ़ाये जाते है इसी से आप अंदाजा लगा सकते है कि वह वहां कितने लोकप्रिय है। अशर ने बताया कि प्रेमचंद हमारे लिए बापू की तरह है और वह भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे बडे एवं प्रतिनिधि रचनात्कार है वह इस उपमहाद्वीप की सभ्यता के व्याख्याकार है।
वह भारत और पाकिस्तान के बीच दोस्ती के सेतू के समान है। उन्होने बताया कि प्रेमचंद की 125 वीं जयंती पाकिस्तान में भी मनायी गई और कई शहरों में प्रेमचंद की दो कहानियों कफन और अमावस की रात का नाटय मंचन भी किया जिस लोगों ने काफी सराहा। साथ ही पाक लेखकों ने यह भी कहा कि पाकिस्तान और हिन्दुस्तान के साहित्य की मूल संवेदना एक ही है। दोनों देश के लेखकों में कोई मतभेद नहीं है। अगर भारत और पाकिस्तान के बीच कोई दूरी है तो वह सियासी स्तर पर है।
(साभार द सॅल्यूशन)

2 comments:

Pratyaksha said...

वाकई खुशी की बात है । पढकर अच्छा लगा ।

MAN KI BAAT said...

बहुत अच्छा लिखा है। महान लेखक प्रेमचंद जन-जन की आवाज़ थे और आज भी (साहित्य के रुप में) हैं।